Thursday, May 24, 2018
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मैं कवि – कभी अक्षर की खेती करता

कभी अक्षर की खेती करता

कभी वस्त्र शब्दों के बुनता

बाग लगाता स्वर-व्यंजन के

मात्राओं की कलियां चुनता

मैं कवि, कृषक के जैसा

करता खेती कविताओं की

और कभी बुनकर बन करके

ढ़कता आब नर-वनिताओं की

भूत-भविष्य-वर्तमान  सभी

तीनों काल मिले कविता में

बर्फ के मानिंद ठंडक मिलती

ताप मिलेगा जो सविता में

मैं भविष्य का वक्ता मुझको

सूझे तीनों काल की बातें

ं मेरी ही कविता को गायक

कैसे-कैसे स्वर में गाते

वेद पुराण गीता और बाईबल

ये सब मेरे कर्म के फल है

डरते मुझसे राजे-महाराजे

कलम में मेरी इतना बल है
— व्यग्र पाण्डेय

गंगापुर सिटी (राज.)

Vyagra Pandey – Gangapur City

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